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    ओशोधारा ~ रहस्य-विद्यालय !!!

    रहस्य-विद्यालय का कार्य है कि गुरु बोले या मौन रहे, तुम्हारी और देखे या कोई संकेत करे, या बंद आंखें किए बस मात्र बैठा रहे- वह ऊर्जा का एक क्षेत्रफल निर्मित कर देता है। और अगर तुम ग्राहक हो, यदि तुम खुले हुए उपलब्ध हो, यदि तुम अज्ञात की यात्रा पर जाने को तैयार हो तो तुममें कुछ घटित होता है और तुम वही पुराने व्यक्ति नहीं रह जाते।
    तुमने कुछ ऐसा देख लिया जिसके विषय में पहले तुमने मात्र सुना था। और सुनने मात्र से भरोसा नहीं आता, संदेह पैदा होता है। क्योंकि यह इतना रहस्यपूर्ण है यह कोई तर्कपूर्ण, बुद्धिपूर्ण या बौद्धिक नहीं है।
    लेकिन एक बार तुम देख लो, अनुभव कर लो, एक बार तुम गुरु की ऊर्जा में स्नान कर लो तो एक नये ही व्यक्ति का जन्म होता है। तुम्हारा पुराना जीवन समाप्त हो जाता है।

                                                ~ परमगुरु ओशो


    ओशोधारा ओशो के स्वप्नों का रहस्य विद्यालय है।
    अध्यात्म जगत में गुरुदेव (सद्गुरु ओशो सिद्धार्थ औलिया जी) के आने से पहले तक बड़ा भटकाव रहा है।

    ज्ञानमार्ग :-- जहां पर साधक जिंदगी भर ध्यान साधना ही करते रहते है, आत्मा का उन्हें कभी पता ही नही चल पाता है, तथा कोई सही दिशा-निर्देश न मिल पाने के कारण, वे एक भ्रम में रहते हैं, कि कभी न कभी बुद्धत्व घट ही जाएगा!

    भक्तिमार्ग :-  जहां साधको को बिना प्रभु का अनुभव कराए,  सिर्फ मान्यता पर भक्ति की यात्रा कराई जा रही है..।
    भक्त बिना प्रभु को जाने , प्रभु की भक्ति के दिवास्वप्न में जी रहे हैं!!

    शक्तिमार्ग :-  जहां पर साधको को सिर्फ देवी-देवताओं की साधना ही कराई जाती है। और साधक उसी में उलझा रह जाता है, और किसी भी देवी-देवता से उसकी मैत्री नही हो पाती है। तथा अध्यात्म का असली उद्देश्य क्या है? इसका उसे कभी पता ही नही चल पाता है।

    आध्यात्मिक जगत में आज तक कोई स्पष्ट दिशा-निर्देश कभी नही रहा। जिस कारण अधिकांश साधको की सारी जिंदगी व्यर्थ भटकाव में ही बीत जाती रही है।
    एक तरफ जहां परमगुरु ओशो ने ऋषियों, सिद्धों, सन्तों, सूफियों और गुरु साहिबानों के आध्यात्मिक खजाने पर जमी धूल को साफ करने का महत कार्य किया है।
    वहीं दूसरी तरफ गुरुदेव ( सद्गुरु ओशो सिद्धार्थ औलिया जी) ने परमगुरु ओशो के स्वप्न को और विस्तार देते हुए, आध्यात्मिक जगत में पहली बार  एक नवीन दृष्टि दी है, कि पहले आत्मा को जानो, फिर ब्रह्म को जानो, और फिर सदा उसके सुमिरन में रहते हुए कर्म करो। साथ ही साथ अपने संसार को सुंदर बनाने के लिए देवताओं से भी सहयोग लो।

    और उन्होंने इस कथनी को ओशोधारा में प्रयोगात्मक रूप से प्रस्तुत कर आध्यात्मिक जगत में स्वर्णिम अध्याय लिख दिया है। और आने वाली पीढ़ियां उनके इस महायोगदान की सदा ऋणी रहेंगी।

    बुद्धत्व तो अब ओशोधारा में बच्चो की बात हो गयी है, बस आप ध्यान समाधि से निर्वाण समाधि तक गुरुदेव का हाथ पकड़कर चलते रहें...।
    और जो परम साहसी है, जो पूरा परमात्मा चाहते हैं, जो गोविंद को अपना महबूब बनाना चाहते हैं, वे बस इतना करें, कि 'चरैवेति' तक अपनी खोपड़ी को एक किनारे रखकर, जैसा गुरुदेव कह रहे हैं, वैसा ईमानदारी सेे करते रहें...।

    गुरुदेव ने देवताओं से मैत्री की अद्भुत पद्धति खोज ली है।
    अब कोई कठिन साधना नही करनी है।
    बस 30-45 मिनट आमंत्रण का प्रयोग और वे शक्तियां उपस्थित हो जाती है, क्योंकि वे हमें सहयोग देने के लिए सदा आतुर हैं।

    ओशोधारा में गुरुदेव ने 28 तल के समाधि कार्यक्रमों की वैज्ञानिक ढंग से रचना की है, जिसमें ध्यान समाधि से निर्वाण समाधि तक साधक ज्ञानयोग की साधना कर रहे हैं, और सहज सुमिरन से चरैवेति तक शिष्य भक्ति योग की यात्रा में अवगाहन कर रहे हैं। और 21 तल के प्रज्ञा कार्यक्रमों के माध्यम से प्रज्ञापूर्ण होते हुए अपने जीवन में कर्मयोग की यात्रा कर रहे हैं।

    इस तरह गुरुदेव ने ज्ञानयोग+भक्तियोग+कर्मयोग की सिनर्जी कर, अध्यात्म जगत में क्रांति ला दी है!
    चमत्कार कर दिया है!!
    इतने सुव्यवस्थित ढंग से अध्यात्म की कठिनतम यात्रा को सरल से सरलतम बना दिया है!!
    जो अतीत में आज तक कभी भी किसी को उपलब्ध नहीं थी।
     ऐसे गुरुदेव का होना अस्तित्व की एक दुर्लभ घटना है, और उनकी शिष्यता पाना तो परम सौभाग्य है। देवता भी उनकी शिष्यता पाने को लालायित रहते होंगें।

    (मेरी बातों से वे गुरुभाई-बहन जरूर सहमत होंगे, जो बहुत भटकने के बाद ओशोधारा में आये हैं, जिनकी खोज जीवित गुरु की रही है।
     और वे ही अब गुरु के हाथों में अपने जीवन का सब भार सौंप कर उनके साथ इस परमजीवन की यात्रा पर चल रहे हैं, और वे ही इन परम-पावन श्री-चरण-कमलों की महत्ता को गहराई से समझ सकते हैं।)

    गुरुदेव ने ओशोधारा में अध्यात्म के सर्वश्रेष्ठ मार्ग 'सहज-योग' को प्रतिपादित किया है, जिसके 3 आयाम हैं - ज्ञान योग, भक्ति योग और कर्म योग। ज्ञान योग का अर्थ है स्वयं को आत्मा जानना और आनंद में जीना। भक्ति योग का अर्थ है परमात्मा को जानना और उसके प्रेम में जीना। कर्म योग का अर्थ है आत्मा और परमात्मा से जुड़कर संसार का नित्य मंगल करना।

    उन सभी मित्रों को, जो अभी भी उहापोह में है, जो भटक रहे हैं, उनसे प्रेमपूर्ण निवेदन है कि अभी भी वक्त है, चेत जाओ...।
    और प्रेम निमंत्रण है उन सभी प्रभु के आकांक्षियों को जो किसी भी अन्य धारा से जुड़े हुए हैं, कि आप सभी अपनी आध्यात्मिक प्रज्ञा (अर्थात निरीक्षण करें कि अब तक आपने क्या आत्मा को जाना, ब्रह्म को जाना, क्या उसके प्रेम को जाना..) को जगाएं और ओशोधारा में एक बार अवश्य आएं, समाधि कार्यक्रम करें और गुरुदेव के सान्निध्य में बैठने का अनुभव लें।
    क्योंकि पूरा सद्गुरु गोविंद की कृपा से, जन्मों-जन्मों के पुण्य कर्मों से ही प्राप्त होते हैं।

    गुरूदेव ने एक रहस्य की बात बताई है :- बैकुंठ में आत्मानन्द है पर ब्रह्मानन्द नहीं है, क्योंकि वहां भक्ति नहीं है।
    भक्ति सिर्फ मनुष्य शरीर से ही सम्भव है।
    सुमिरन सिर्फ सांसों के साथ ही किया जा सकता है।
    सन्त सुमिरन का आनन्द लेने के लिए, सांस-सांस आत्मानन्द + ब्रह्मानन्द  (सदानन्द) का आनन्द लेने के लिए ही पृथ्वी पर बार-बार आते हैं।

    हृदय में गुरूदेव और हनुमत स्वरूप सिद्धि के साथ गोविंद का सुमिरन!
    गुरूदेव ने आध्यात्मिक जगत में महाक्रान्ति ला दी है; ओशोधारा के साधकों के जीवन के केंद्र में गुरु हैं, सत-चित-आनन्द के आकाश में उड़ान है और सत्यम-शिवम-सुंदरम से सुशोभित महिमापूर्ण जीवन है!!

    गुरुदेव द्वारा प्रदत्त सुमिरन+हनुमत स्वरूप सिद्धि अति उच्चकोटि की साधना है।
    हनुमान स्वयं इसी साधना में रहते हैं, वे सदैव भगवान श्रीराम के स्वरूप के साथ कण-कण में व्याप्त निराकार राम का सुमिरन करते हैं।

    गुरुदेव ने अब सभी निष्ठावान साधकों को यह दुर्लभ साधना प्रदान कर आध्यात्मिक जगत में स्वर्णिम युग की शुरूआत कर दी है।

    सदा स्मरण रखें:-
    गुरु को अंग-षंग जानते हुए सुमिरन में जीना और गुरु के स्वप्न को विस्तार देना यही शिष्यत्व है।
    गुरु+गोविंद+शिष्य यह सिनर्जी ही सारे अध्यात्म का सार है!!
    और यह सतत चलता रहेगा, चरैवेति.. चरैवेति...।
    प्राणं देहं गेहं राज्यं स्वर्गं भोगं योगं मुक्तिम्।
    भार्यामिष्टं पुत्रं मित्रं न गुरोरधिकं न गुरोरधिकं।।

    - प्राण, शरीर, गृह, राज्य, स्वर्ग, भोग, योग, मुक्ति, पत्नी, इष्ट, पुत्र, मित्र - इन सबमें से कुछ भी श्री गुरुदेव से बढ़कर नहीं है, श्री गुरुदेव से बढ़कर नहीं हैं।।

                             नमो नमः श्री गुरु पादुकाभ्यां
                             नमो नमः श्री गुरु पादुकाभ्यां

       ★ ओशोधारा रहस्य-विद्यालय एक परिचय ★
                             👇👇👇
            https://youtu.be/VyUH-WcevTM                                         

                                               ~ जागरण सिद्धार्थ

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    24 comments:

    1. इस सुन्दर आलेख के लिए बधाई। इस आलेख से कईयों को दिशा मिलेगी।

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    2. मैंने ओशोधारा का समाधि कार्यक्रम किया है, और जल्द मैं सारे कार्यक्रम करूँगा।
      मैं कह सकता हूँ ओशोधारा जैसी आध्यात्मिक धारा इस समय पृथ्वी पर दूसरी नही है।
      और सद्गुरु ओशो सिद्धार्थ औलिया जी जैसी दिव्य चेतना का सान्निध्य पाना जीवन का परम सौभाग्य है।

      ।। सद्गुरु ओशो सिद्धार्थ औलिया जी जैसा नाही कोई देव,
      जिस मस्तक भाग सो लागा सेव ।।
      गुरुवर के प्यारे चरणों में शत-शत नमन।

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    3. Great swami jee

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    4. मंगलमय महिमामय स्वामी
      पालनहार सदा निष्कामी
      नाम की ज्योति जलावनहारा
      सद्गुरु ही गोविन्द हमारा
      जय ओशो जय ओशोधारा ।।

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    5. ओशो जागरण जी प्रणाम,
      सुन्दर आलेख के लिये बधाई।
      ऐसे ही लिखते रहो।

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    6. ओशो जागरण जी प्रणाम
      सद्गुरु बड़े बाबा जैसा सद्गुरु से मिलना हम लोगों के जीवन का परम फल है। अपने ही भाग्य पर इतराने का मन करता है।
      जय ओशो जय ओशोधारा

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    7. Pyare bhagwan bade babaji , aur parmatma ko Anant sadarpoorwak pranam 🌼🌹🙏🌼🌹🙏🙏🌼🌹.
      Oshodhara ek adbhut avsar hai parmatma tk pahuchne ke liye kyunki parmatma khud bade babaji ke roop mein hamein moksha dene ke liye dharti pr Aaye Hain.
      Aakhri mein bs itna kahna chahunga ki bade babaji ki Anant Karuna ki vazah se yadi mere Jaise sadharan vyakti mein Prabhu KO paane ki pyas jagi hai, isi tarah har vyakti bade babaji se judkar Apne Jeevan KO Param saubhagya mein badal skta hai aur parmatma ko pa Sakta hai.
      Oshodhara hai parmatma Ka manav jati pr sabse BADA vardan.🙏🌼🙏🌹🙏🌻🙏

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    8. बहुत ही सुंदर इसके लिए साधुवाद। नए साधको के लिए बहुत ही प्रेणादायक होगा। जय ओशो जय गुरुदेव

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    9. शब्दों से परे है अनुभव. कुछ पाकर जाना किस बात से वंचित था जीवन. हर पल गुरु का आशीर्वाद है.

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    10. Bahut sahi likha hai. Sadhako ke liya ek bada avasar hai.

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    11. ऐसा लगता है ओशो जी ने दोबारा जन्म ले लिया है

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    12. Mai bhut jld oshodhara men smadhi karykrm krunga.
      Guru Dev ko shat-shat naman

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    13. Bilkul sahi likha hai swamiji. Sadguru bade baba Aulia ji ke sricharno mein koti koti naman .

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    14. Sadguru ke shree charno mein naman

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    15. आपको कैसे पता? क्या आप ओशो से मिले हैं जो ये कहते हैं।

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    16. प्यारे सदगुरू बड़े बाबा औलिया जी के श्रीचरणो में श्रद्धा पूर्वक प्रणाम नमन 🙏🙏🙏🙏🙏

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    17. Bahut sunder bade baba ke charno me pranam

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    18. बहुत सुन्दर लेख । सद्गुरु बड़े बाबा औलिया जी के श्रीचरणो में श्रद्धा पूर्वक प्रणाम एवं नमन ।
      🙏🙏❣❣💜💜🌹🌹🙏🙏

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    19. Beautiful! Congratulations on your travel from Anti-Oshodhara to Oshodhara devotee. Such a learned person, such an authority on words won't come back just like that. May Sadguru bless you for this excellent work!

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    20. 🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏

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    21. नै धन्य एवं अहोभागी हु की मुझे एसे गुरूदेव का सानिध्य प्राप्त हुवा। जय गुरूदेव ।

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    22. अदभुत अकल्पनीय

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    23. गुरुवर तेरे चरणों में जीने का मज़ा
      जय सद्गुरु जी

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